सामान्य अध्ययन-भूगोल, विज्ञान, इतिहास, कला और संस्कृति : ancient india

सामान्य अध्ययन- भारतीय इतिहास, कला और संस्कृति, विज्ञान, भूगोल, राजनीति शास्त्र

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Saturday, June 9, 2018

हड़प्पाकालीन कांस्य रथ की प्राप्ति

June 09, 2018 0
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने उत्तर प्रदेश के बागपत जिले के सनौली गाँव से 2200 ईपू से 1800 ईपू के बीच के कांस्य रथ के अवशेष की प्राप्ति का दावा किया है. पुरातत्ववेताओं के अनुसार, यह एक महत्वपूर्ण खोज है, जो कांस्य कालीन सैनिक सभ्यता की उपस्थिति की ओर संकेत करता है.
           पुरातत्वविद आर के श्रीवास्तव के अनुसार, आज से लगभग पाँच हजार वर्ष पुराने ये अवशेष संभवत: हड़प्पा सभ्यता से जुड़े हैं.
      उत्खनन में कांस्य रथ के अतिरिक्त, ताँबे के तलवार, ढाल, मुकुट, धूसर मृद्भाँड, पहिए, शिरस्त्राण, गहनों आदि की भी प्राप्ति हुई है. इसके अतिरिक्त उत्खनन में राजकीय शवाधान के प्रमाण भी प्राप्त हुए हैं. प्राप्त अवशेष एक समृद्ध सभ्यता की ओर संकेत करते हैं. उल्लेखनीय है कि इस काल के मेसोपोटामिया और ग्रीस से भी कांस्य रथ प्राप्त हो चुके हैं.
        उत्खनन में पूर्ण शवाधान के अतिरिक्त कलश शवाधान और सांकेतिक शवाधान के प्रमाण भी मिले हैं. ताबूत के ऊपर कई तरह के चित्र और डिजाइन बनाए गए हैं.
        इन नयी खोजों ने भारतीय प्राचीन इतिहास को नयी दृष्टि से देखने की आवश्यकता पर एक बार फिर बल दिया है.

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Monday, April 16, 2018

हड़प्पा सभ्यता के विभिन्न चरण

April 16, 2018 0

वर्तमान पाकिस्तान और पश्चिमी भारत में लगभग 2500 ई पू के आसपास हड़प्पा सभ्यता (परिपक्व चरण) पल्लवित हुई. परिपक्व हड़प्पा सभ्यता को ताम्र-पाषाण युग के तीसरे चरण की सभ्यता माना जाता है.
         सभ्यता का पहला उत्खनित स्थल हड़प्पा है, जिसका उत्खनन 1921 में श्री दयाराम साहनी के नेतृत्व में हुआ. 1922 में राखालदास बनर्जी ने मोहनजोदड़ो का उत्खनन किया. पुरातात्विक प्रमाणों से यह स्पष्ट है कि हड़प्पा सभ्यता का विकास अनायास या रातोंरात नहीं हुआ, बल्कि पूर्ववर्ती सभ्यताओं के चरणबद्ध विकास ने अंततः हड़प्पा जैसी विकसित नागरिक सभ्यता का रूप लिया.

उद्भव और विकास :

हड़प्पा सभ्यता के उद्भव और विकास को चार चरणों में देखा जा सकता है...
(क) प्रथम चरण : इस चरण में पूर्वी बलूचिस्तान में घुमक्कड़ पशुचारकों का स्थायी कृषि की ओर उन्मुख होना देखा जा सकता है. भेड़ और बकरी जैसे पशुओं को पालने के प्रमाण भी इस चरण में मिलते हैं. इस चरण में फ्लेक और प्रस्तर निर्मित उपकरणों का प्रयोग देखा गया है. हस्तनिर्मित मृद्भांड भी कई स्थलों से प्राप्त हुए हैं. किली गुल मुहम्मद. रानी घुंडई, डाबरकोट, अंजीरी आदि इस चरण के महत्वपूर्ण प्राप्त स्थल हैं.
(ख) द्वितीय चरण : इस चरण में ताम्र प्रयोग के साक्ष्य मिलते हैं. बड़े ग्रामों की संख्या में वृद्धि के साथ-साथ नगरों के उदय की दृष्टि से यह चरण महत्वपूर्ण है. हस्तनिर्मित और चाक से बने मृद्भांडों पर ज्यामितीय चित्र अंकित मिलते हैं. इस चरण के महत्वपूर्ण स्थल हैं- किली गुल मुहम्मद, मुंडीगक, दम्बसादात, रानी घुंडई और नाल.
(ग) तृतीय चरण : ग्रामीण जीवन के स्थिरीकरण के साथ क्षेत्रीयकरण के प्रमाण इस चरण में दिखाई देते हैं. ताम्र और कांस्य के पिन और चाकू जैसे उपकरण प्राप्त हुए हैं. स्त्रियों और पशुओं की प्रतिमाओं की प्राप्ति कई स्थलों से हुई है. मृद्भांडों पर पक्षियों के चित्र भी मिलते हैं. दक्षिणी बलूचिस्तान, दक्षिण पश्चिम सिंध, मोहनजोदड़ो, मुंडीगक, दम्बसादात, रानी घुंडई, आमरी, कोटदीजी और कालीबंगन आदि इस चरण के प्रमुख स्थल हैं.
(घ) चतुर्थ चरण: यह हड़प्पा सभ्यता का परिपक्व चरण है. यहाँ बड़े नगरों का उदय और उद्योग धंधों के विकास के साक्ष्य प्राप्त होते हैं.
(ङ) पंचम चरण: यह परिपक्व हड़प्पा सभ्यता के अवसान का काल है. बड़े-बड़े नगर धीरे-धीरे विलुप्त होते जाते हैं. इसे कब्रिस्तानी संस्कृति या सेमेट्री एच कल्चर भी कहते हैं.

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Saturday, October 7, 2017

हड़प्पा सभ्यता - कला का विकास

October 07, 2017 0
हड़प्पा सभ्यता की खोज भारतीय कला के इतिहास की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है. इसने भारतीय कला के विकास में एक गौरवपूर्ण अध्याय जोड़ा है. हड़प्पाई स्थलों से प्राप्त चित्रित मृद्भांड (BSRW) ,कांस्य मूर्तियाँ ,पाषाण मूर्तियाँ आदि कलात्मकता की दृष्टि से उल्लेखनीय हैं. मुद्राओं पर हाथी ,बैल, गैंडा ,भैंसा , कुत्ता ,कछुआ आदि के चित्र प्राप्त हुए हैं. एक मुद्रा पर एक सींग वाले व्यक्ति का अंकन का है ,जिसके चारों ओर विभिन्न पशु हैं. इसे शिव का आदि रूप पशुपति माना गया है. एक मुद्रा पर एक योगी और एक फुंफकारते हुए सर्प का चित्रण है.
Dancing Girl of  Mohenjodaro PC: http://www.nationalmuseumindia.gov.in

मोहनजोदड़ो से प्राप्त नर्तकी की कांस्य प्रतिमा - यह भारत की पहली धातु मूर्ति के रूप में ख्यात है . इस नग्न आकृति का बांयां हाथ चूड़ियों से भरा हुआ है, जबकि दाहिना हाथ कूल्हे पर है.   इसके गले में हार है और बालों का जूड़ा बना हुआ है. वर्तमान में 5.5" लम्बी यह मूर्ति राष्ट्रीय संग्रहालय दिल्ली में रखी हुई है.

हड़प्पा से प्राप्त पुरुष धड़ - हड़प्पा से प्राप्त पुरुष धड़ लाल चूना पत्थर से बनी मूर्ति का है. सामने से बनी हुई 3" की यह मूर्ति भी नग्न है. पेट की बनावट प्राणायाम करते योगी की तरह है.

मातृदेवी - टेराकोटा निर्मित मातृदेवी की मूर्ति कई हड़प्पाई स्थलों से प्राप्त हुई है. चौड़े कूल्हे , गहनों से भरा भारी वक्ष स्थल तथा  विस्तृत केश सज्जा इन मूर्तियों में देखी जा सकती है. इससे प्राचीन भारतीय संस्कृति में मातृ पूजा का प्रमाण मिलता है. संभवतः यह जीवन तथा उर्वरता का प्रतीक रही होगी. स्कर्ट पहने इन मूर्तियों के सिर पर पंखानुमा पगड़ियाँ भी हैं.

कूबड़दार बैल की मुहर  - मोहनजोदड़ो से प्राप्त सेलखड़ी की कुछ मुद्राओं पर कूबड़ वाले बैल का अंकन है. मुहर को उभार कर बैल की आकृति बनाई गई है. बैल के लम्बे सींग ,झालरदार गर्दन तथा लम्बी पूँछ बनाने में काफी कलात्मकता दिखाई गई है.
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Thursday, October 5, 2017

ताम्र पाषाण युग कृषक संस्कृति

October 05, 2017 0
पत्थर और तांबे के उपकरणों का साथ- साथ प्रयोग के कारण ताम्र - पाषणिक संस्कृति कहलाई, ये तो शहरी हैं हडप्पा काल की। मानव के उपयोग में आने वाली सबसे पहली धातु तांबा है, इस युग के लोग अधिकांशतः पत्थर और तांबे की वस्तुओं का प्रयोग करते थें। मुख्यतः ग्रामीण समुदाय थे, छः भागों में विभक्त 1. अहाड़ बनास क्षेत्र 2. मध्य प्रदेश 3. उतरी डकेन 4. डकेन (भारत का दक्षिणी पठार) क्षेत्र 5. गंगा का दोआब क्षेत्र  6. पूर्वी क्षेत्र।
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प्रस्तर काल : नव पाषाण युग

October 05, 2017 0
नव पाषाण युग में समाज में अनेक आर्थिक और दूरगामी परिवर्तन हुए.
 इस युग का मानव खाद्य उत्पादक था.
 आरम्भ 7000 .पू. , भारत में पायी गई बस्तियां 4000 . पू. से पुरानी नहीं.
भारत में इस युग के अवशेष पाये जाने वाले स्थल - कश्मीर में बुर्जाहोम , गुफ्फकरल  और मार्तड, दक्षिण में ब्रह्मगिरि , संगलकल्लु, पिखलीहल , मास्की, नागार्जुनकोण्डा उन्तुर नरजीपुर और टेक्कलकोटा, पूर्वी क्षेत्र में दाओजली, हैडिंग, चिरन्द और बारूडीह.
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प्रस्तर युग : मध्य पाषाण युग

October 05, 2017 0

हिमयुग की समाप्ति के साथ- साथ उच्च पाषण काल का भी अन्त हो गया। उसके बाद मध्य पाषाण युग आरम्भ हुआ। लोग मुख्यतः आखेटक तथा पशुपालक थे।
इस युग के प्रमुख स्थल जहाँ खुदाई हुई - पश्चिम बंगाल में बीरभानपुर, तमिलनाडु में टेरीस्थल, गुजरात में लघंनाज, राजस्थान में बागौर , मध्यप्रदेश में भीमबेटका और आदमगढ़ , उतर प्रदेश में सराय नाहर राय। 
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Thursday, September 28, 2017

प्रस्तर युग: पुरा पाषाण काल

September 28, 2017 0

नवीनतम अनुसंधानो और अध्ययन से ज्ञात होता है कि मानव लगभग 30 लाख वर्ष पुराना है. आदिम मानव के जीवाश्म भारत में नहीं मिले है. मानव के प्राचीनतम अस्तित्व का संकेत द्वितीय हिमावर्तन (ग्लेसिएशन) काल के बताए जाने वाले संचयों में मिले पत्थर के औजारों से मिलता है  जिनका काल लगभग 2,40000 . पू. रखा गया.
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Tuesday, June 2, 2015

धोलावीरा : हड़प्पा सभ्यता का एक महत्वपूर्ण स्थल

June 02, 2015 0

हड़प्पा सभ्यता के पांच विशालतम स्थलों में से एक धौलावीरा ( गुजरात ) भारत के सर्वाधिक महत्वपूर्ण हड़प्पाकालीन स्थलों में से है .यह कच्छ के रन में स्थित एक द्वीप खादीर में है . अन्य हड़प्पाई स्थल जहाँ दो बड़ों हिस्सों में विभाजित है ,वहीँ धौलावीरा में उच्च नगर और निम्न नगर के अतिरिक्त एक मध्य नगर की उपस्थिति के संकेत मिलते हैं .अभी हाल ही में धौलावीरा से पुरातत्वविदों को एक 5000 वर्ष पुरानी बावली प्राप्त हुई है .

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Wednesday, October 15, 2014

हड़प्पा सभ्यता

October 15, 2014 0
यद्यपि भारतीय उपमहाद्वीप में मानव निवास के साक्ष्य काफी पहले से मिलते रहे हैं , ई.पू . 7500-7000 के आसपास मेहरगढ़ से नव पाषाण काल के अवशेष मिले हैं , तथापि हड़प्पा सभ्यता को उपमहाद्वीप की प्रारम्भिक सभ्यताओं में सर्वाधिक उल्लेखनीय माना जा सकता है .
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Sunday, October 5, 2014

ब्राह्मण साहित्य

October 05, 2014 0
वेद
वेद एक महत्त्वपूर्ण ब्राह्मण धर्म-ग्रंथ है। वेद शब्द का अर्थ ज्ञानमहतज्ञान अर्थात पवित्र एवं आध्यात्मिक ज्ञानहै। यह शब्द संस्कृत के विद्धातु से बना है जिसका अर्थ है जानना। वेदों के संकलनकर्ता 'कृष्ण द्वैपायन' थे। कृष्ण द्वैपायन को वेदों के पृथक्करण-व्यास के कारण 'वेदव्यास' की संज्ञा प्राप्त हुई। वेदों से ही हमें आर्यो के विषय में प्रारम्भिक जानकारी मिलती है। कुछ लोग वेदों को अपौरुषेय अर्थात दैवकृत मानते हैं।
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भारतीय इतिहास के स्त्रोत

October 05, 2014 0
भारतीय इतिहास के स्रोतों को तीन भागों में विभाजित किया जा सकता हैं-साहित्यिक साक्ष्य,विदेशी यात्रियों का विवरण,पुरातत्त्व सम्बन्धी साक्ष्य

साहित्यिक साक्ष्य

साहित्यिक साक्ष्य के अन्तर्गत साहित्यिक ग्रन्थों से प्राप्त ऐतिहासिक वस्तुओं का अध्ययन किया जाता है। साहित्यिक साक्ष्य को दो भागों में विभाजित किया जा सकता है- धार्मिक साहित्य और लौकिक साहित्य।
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भारतीय इतिहास : आरंभिक संकेत

October 05, 2014 0
भारत में मानवीय कार्यकलाप के जो प्राचीनतम चिह्न अब तक मिले हैं, वे 4,00,000 ई. पू. और 2,00,000 ई. पू. के बीच दूसरे और तीसरे हिम-युगों के संधिकाल के हैं और वे इस बात के साक्ष्य प्रस्तुत करते हैं कि उस समय पत्थर के उपकरण काम में लाए जाते थे। जीवित व्यक्ति के अपरिवर्तित जैविक गुणसूत्रों के प्रमाणों के आधार पर भारत में मानव का सबसे पहला प्रमाण केरल से मिला है जो सत्तर हज़ार साल पुराना होने की संभावना है। इस व्यक्ति के गुणसूत्र अफ़्रीक़ा के प्राचीन मानव के जैविक गुणसूत्रों (जीन्स) से पूरी तरह मिलते हैं।इसके पश्चात एक लम्बे अरसे तक विकास मन्द गति से होता रहा, जिसमें अन्तिम समय में जाकर तीव्रता आई और उसकी परिणति 2450 ई. पू. के लगभग सिन्धु घाटी की आलीशान सभ्यता (अथवा नवीनतम नामकरण के अनुसार हड़प्पा संस्कृति) के रूप में हुई। हड़प्पा की पूर्ववर्ती संस्कृतियाँ हैं: बलूचिस्तानी पहाड़ियों के गाँवों की कुल्ली संस्कृति और राजस्थान तथा पंजाब की नदियों के किनारे बसे कुछ ग्राम-समुदायों की संस्कृति।यह काल वह है जब अफ़्रीक़ा से आदि मानव ने विश्व के अनेक हिस्सों में बसना प्रारम्भ किया जो पचास से सत्तर हज़ार साल पहले का माना जाता है।
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